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अमेरिका में ट्रंप की हार का भारत-अमेरिका संबंधों पर क्या होगा असर

अमेरिकी मिडटर्म चुनावों में डेमोक्रेट्स की जीत के बाद ट्रंप प्रशासन की शक्तियों पर अंकुश लगने से भारत के लिए व्यापार, रक्षा और कूटनीति के नए समीकरण बन सकते हैं।

तस्वीर: punjabkesari.com

अमेरिका में हाल ही में हुए मिडटर्म चुनावों के नतीजों ने वहां की राजनीतिक परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया है। रिपब्लिकन पार्टी के नेता डोनाल्ड ट्रंप ने प्रतिनिधि सभा और सीनेट दोनों में बहुमत खो दिया है, जिससे उन्हें 'लेम-डक' प्रेसिडेंट का लेबल दिया जा रहा है। इस हार का असर सिर्फ अमेरिकी घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका प्रभाव वैश्विक राजनीति और विशेष रूप से भारत-अमेरिका संबंधों पर भी गहरा पड़ने का अनुमान है।

चुनावी नतीजों के अनुसार, प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रेट्स को 228 सीटें मिलीं, जबकि रिपब्लिकन 139 सीटों पर सीमित रहे हैं। सीनेट में भी डेमोक्रेट्स और उनके सहयोगियों को 54 सीटें मिली हैं, जो बहुमत के लिए जरूरी 51 सीटों से अधिक है। इसका सीधा मतलब यह है कि अब ट्रंप प्रशासन कोई भी बड़ा बिल पास कराने, बजट में बदलाव करने या नई नीतियां लागू करने के लिए डेमोक्रेट्स की सहमति के बिना आगे नहीं बढ़ पाएंगे। हालांकि, ट्रंप जनवरी 2029 तक राष्ट्रपति पद पर बने रहेंगे और विदेश नीति से जुड़े तत्काल फैसलों में उनकी शक्ति अभी भी प्रभावशाली रहेगी।

भारत के लिए नए समीकरण और चुनौतियां

भारत के लिए यह बदलाव कई मायनों में महत्वपूर्ण है। पिछले कुछ समय से भारत और अमेरिका के बीच व्यापार, रूस से तेल की खरीद और अन्य मुद्दों पर तनाव देखा गया है। ट्रंप की कमजोर स्थिति के कारण अमेरिका की तरफ से भारत पर लगाए जा रहे दबावों में बदलाव आ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अब अमेरिका-भारत व्यापार समझौते की शर्तें नए सिरे से तय की जा सकती हैं, क्योंकि ट्रंप की मनमानी पर संसद से लगाम लग गई है।

विदेश नीति विशेषज्ञ सी. राजा मोहन का कहना है कि भारत को अमेरिका के साथ अपने रिश्तों को किसी एक पार्टी या राष्ट्रपति के भरोसे नहीं छोड़ना चाहिए। उनका मानना है कि दोनों देशों के बीच लंबे समय से अटका हुआ व्यापार समझौता पूरा करने और रक्षा, ऊर्जा तथा तकनीक के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए। भारत को अमेरिकी राजनीति को गहराई से समझना होगा, क्योंकि वहां दोनों बड़ी पार्टियों के अंदर भी विदेश नीति को लेकर अलग-अलग राय रखने वाले नेता मौजूद हैं।

भारतीय मूल के प्रवासी भी इस बदलाव से प्रभावित हैं। एच-1बी वीजा नियमों की सख्ती के कारण भारतीय आईटी पेशेवरों की मुश्किलें बढ़ी हैं, जिसके कारण 62 प्रतिशत भारतीय मूल के मतदाताओं ने डेमोक्रेट्स का समर्थन किया। अब डेमोक्रेट्स के दबाव में इन वीजा नियमों को सरल बनाने की उम्मीद है। इसके अलावा, अमेरिका की तरफ से रूस से तेल की खरीद पर लगाए जा रहे दबाव का औचित्य भी कम हो गया है, क्योंकि अमेरिका खुद रूस से डीजल की खरीद कर रहा है।

अमेरिकी मिडटर्म चुनावों में भारतीय मूल के उम्मीदवारों ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। पिया डांडिया, रो खन्ना, सुहास सुब्रामण्यम और प्रतिमा जयपाल ने जीत दर्ज की, जबकि अरुणा मिलर मेरिलैंड की उप-राज्यपाल के पद पर बनी रही। इनकी जीत अमेरिकी राजनीति में भारतीय समुदाय की बढ़ती ताकत को दर्शाती है, जो भविष्य में भारत-अमेरिका संबंधों में एक महत्वपूर्ण कड़ी साबित हो सकती है।

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पृष्ठभूमि

अमेरिका में मिडटर्म चुनाव हर चार साल के राष्ट्रपति चुनाव के बीच होते हैं। इस बार की हार की मुख्य वजह अमेरिका में बढ़ती महंगाई, ईरान युद्ध के खर्च और रोजगार की कमी को माना जा रहा है। ट्रंप की कमजोर स्थिति को 'लेम-डक' अवधि कहा जाता है, जिसमें राष्ट्रपति को घरेलू राजनीति में बाधाएं होती हैं, लेकिन विदेश नीति में वे जोखिम लेने के लिए अधिक तैयार हो सकते हैं।

स्रोत

यह ख़बर इन 3 स्रोतों के आधार पर तैयार की गई है:

  • punjabkesari.com — लेम-डक ट्रंप और भारत
  • prabhatkhabar.com — अमेरिका में कमजोर पड़े ट्रंप, भारत-US रिश्तों पर क्या होगा असर?
  • tv9hindi.com — 'हम ट्रंप को मार देंगे', मिडटर्म इलेक्शन में रिपब्लिकन की हार के बाद ईरान में लगे पोस्टर

यह लेख ऊपर दिए स्रोतों के आधार पर आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की मदद से लिखा गया है। हम कैसे काम करते हैं।

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