स्कूलों में बढ़ती बाल हिंसा: हरियाणा और आंध्र प्रदेश की घटनाओं ने उठाए गंभीर सवाल
हरियाणा के पंचकूला और आंध्र प्रदेश के राप्ताडु में स्कूलों में हुई दो अलग-अलग हिंसक घटनाओं ने बच्चों के बीच बढ़ती आक्रामकता को लेकर चिंता जताई है। विशेषज्ञ डिजिटल सामग्री और पारिवारिक माहौल को इसका मुख्य कारण बता रहे हैं।

देश के दो अलग-अलग राज्यों में हाल ही में हुई घटनाओं ने स्कूलों में बच्चों के बीच बढ़ती हिंसा को लेकर गंभीर चिंताओं को जताया है। 28 अक्टूबर को हरियाणा के पंचकूला स्थित एक सरकारी स्कूल में 8 वर्षीय छात्र ने 6 वर्षीय सहपाठी पर बेरहम हमला किया था। इस घटना के सीसीटीवी फुटेज सामने आने के बाद पूरे समाज और शिक्षा व्यवस्था में दहशत फैल गई है।
इसी तरह, 31 अक्टूबर को आंध्र प्रदेश के राप्ताडु में एक सरकारी स्कूल में 21 वर्षीय व्यक्ति ने कक्षा में घुसकर 10वीं कक्षा की दो छात्राओं पर चेनसॉ से हमला कर दिया। इस हमले में दोनों छात्राएं गंभीर रूप से घायल हो गईं। ये दोनों घटनाएं यह दर्शाती हैं कि हिंसा अब सिर्फ बड़ों तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह बच्चों के बीच भी आम हो रही है।
डिजिटल सामग्री और पारिवारिक माहौल का प्रभाव
विशेषज्ञों और समाज विज्ञानियों का मानना है कि बच्चों में हिंसक प्रवृत्ति के पीछे कई कारण हैं। इनमें से एक बड़ा कारण डिजिटल मीडिया की ओर बच्चों का बढ़ता कल्ला है। आजकल बच्चे अपना बहुत समय स्मार्टफोन, लैपटॉप और टीवी के सामने बिताते हैं। 'पबजी' और 'फ्री फायर' जैसे हिंसक वीडियो गेम्स और वेब सीरीज बच्चों के मन पर गहरा असर डाल रही हैं। लगातार स्क्रीन पर खून-खराबा और लड़ाई देखने से बच्चों का संवेदनशील तंत्र सुन्न हो जाता है और वे असल ज़िंदगी में भी हिंसा को एक सामान्य समाधान मानने लगते हैं।
पंचकूला की घटना से जुड़ी शुरुआती जानकारी के मुताबिक, उस 8 वर्षीय बच्चे को हिंसक वीडियो गेम खेलने का शौक था। इसके अलावा, घर का माहौल भी बच्चों के व्यवहार को प्रभावित करता है। यदि माता-पिता के बीच लगातार झगड़े होते हैं या बच्चों को सुधारने के नाम पर शारीरिक दंड दिया जाता है, तो बच्चे गुस्से को व्यक्त करने के लिए हिंसक रास्ते अपना लेते हैं। बच्चे अपने आसपास जो देखते हैं, वही सीखते हैं।
समाधान के रास्ते
मनोचिकित्सकों और विशेषज्ञों के अनुसार, इस समस्या को हल करने के लिए माता-पिता, शिक्षकों और समाज को मिलकर प्रयास करने होंगे। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों के डिजिटल कंटेंट पर नजर रखें और उन्हें हिंसक गेम्स की जगह रचनात्मक और ज्ञानवर्धक गतिविधियों से जोड़ें। बच्चों के साथ रोजाना समय बिताकर उनसे खुलकर बात करना भी जरूरी है ताकि वे असुरक्षित महसूस न करें।
स्कूलों और परिवारों में बच्चों को नैतिक मूल्यों, सहानुभूति और क्रोध नियंत्रण के तरीके सिखाने पर बल दिया जा रहा है। योग और खेलकूद बच्चों की ऊर्जा को सही दिशा देने में मददगार साबित हो सकते हैं। बच्चे देश का भविष्य हैं, इसलिए उन्हें एक ऐसा सुरक्षित और प्यार भरा माहौल देना होगा जहां वे अपने गुस्से को रचनात्मकता में बदल सकें, न कि हिंसा में।
हालांकि, कुछ तर्क यह भी देते हैं कि बच्चों को हथियारों वाले खिलौने देने और हिंसक टीवी सीरियल देखने की आदत डालने से भी यह समस्या बढ़ रही है। ऐसे में यह जरूरी है कि बड़ों को समझना होगा कि न तो हर किस्म की हिंसक सामग्री बच्चों के लिए उपयुक्त है, और न ही हथियारों वाले खिलौने का असर मासूम रहता है।
पृष्ठभूमि
पिछले कुछ वर्षों में भारत में स्कूलों और सार्वजनिक स्थानों पर बच्चों के बीच हिंसक घटनाओं की संख्या में वृद्धि देखी गई है। डिजिटल तकनीक के बढ़ते प्रयोग और बदलती जीवनशैली के कारण बच्चों की मानसिक स्थिति और व्यवहार पर असर पड़ रहा है, जिससे समाज में चिंता का माहौल है।
स्रोत
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- punjabkesari.com — घटती मासूमियत, बढ़ती हिंसा
यह लेख ऊपर दिए स्रोतों के आधार पर आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की मदद से लिखा गया है। हम कैसे काम करते हैं।


